आधुनिक युग विज्ञान एवं अर्थ का युग है

सकारात्मक सोच

 

आधुनिक युग विज्ञान एवं अर्थ का युग है। मनुष्य अपनी सुख-सुविधाओं तथा रुपयों के वृद्धि करने में इस आपाधापी में किस ओर भागा जा रहा है ? क्या हासिल होना है अंततः सब कुछ इसी फूलों पर छोड़ कर चले जाना है। फिर थोड़ी-सी सुख सुविधाओं के कारण मनुष्य अपने मूल्यों को नहीं समझ पाता है। मानव अपनी सुख-सुविधाओं, गाड़ी बंगला शोहरत और पैसों को ही आनंद-सुख मानता है। चौबीसों घण्टे उसी की प्राप्ति में लगे रहता है। साम दाम दंड भेद नीति को अपना, बस आगे निकलना चाहता है अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता है। इन सब के पीछे उसकी अहंकारी प्रवृत्ति ही है।आज का मानव चाटुकारिता की सारी सीमाएं लाँघ चुका है। जरा सा पद, नाम व लोगों की सहानुभूति, लेने, अपनी झूठी पहचान/छाप बनाने हेतु जरा सा मौका भी नही चूकता।परन्तु वह कितना झूठा, चापलूस, मक्कार है इसका पता लोगों को शीघ्र ही चल जाता है क्योंकि कहावत है कि काठ की हांडी बार-बार नही चढ़ती।

 

इतिहास बताता है कि निक्कमे, आलसी व अकर्मण्यता की प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों में यह चापलूसी-तलवे चाटने की प्रवृति सबसे अधिक पाई जाती है क्योंकि वह आराम, सुख-सुविधा चाहता है, अपने लोगों में प्रसिद्ध होना चाहता है। ऐसे व्यक्ति राष्ट्र का विनाश ही कर सकते हैं विकास में उनकी कोई भागीदारी नही होती। सही मायनों में ये जयचंद होते हैं जो रूप बदल-बदल कर बार-बार आ धमकते हैं।

 

इनके विपरीत जो सच्चे, कर्मशील व्यक्ति होते हैं वे बिना किसी स्वार्थ, प्रशंसा के अपने कार्यों में लगे ही नही रहते बल्कि उन कार्यों को बेहतर से बेहतर करने का भरसक प्रयास करते हैं। अपने मिले कार्यों के अलावा और भी कार्य शांत रह कर करते रहते हैं। असली राष्ट्र नायक-राष्ट्र भक्त तो ये हैं। परंतु बड़े दुख की बात ये है कि इन्हें कोई पहचान नही पाता।इनकी वफादारी, कर्मशीलता-चाटुकारिता के फैले अंधियारे में कहीं गुम हो जाती है निगल जाता है इनकी कर्मण्यता को चापलूसी का मगर क्योंकि आज ऑफिस के बोस से लेकर लगभग हर कुर्सी धारक के कान अपनी प्रशंसा सुनने को तरसते रहते हैं तब वे इन्ही चापलूसों को खोजते हैं उन कर्मशील लोगो को नही। उन्हें तो बस डांटने-धुत्कारने का, उनका अधिक से अधिक शोषण करने का काम लिया जाता है। वे बेचारे प्रशंसा की एक थपकी पाने को, दो बोल सुनने को तरसते रहते हैं पर जिनके इर्दगिर्द चापलूसी दुर्गंध इतनी रच बस गई हों उन तक राष्ट्र की सोंधी सच्ची भारतीयता की खुशबू भला कैसे पहुँचे।

 

आज प्रवृत्ति ये है कि यहाँ लोग प्रतिदिन नए नए मुखोटे लगा अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। उनके जहन में कहीं भी दूर-दूर तक राष्ट्र प्रेम, मानवता नही है वो अलग बात है कि उनकी हर एक्टिविटी में राष्ट्र भक्ति, सच्ची मानवता झलकती है। लगता है जैसे यही सच्चे राष्ट्र व मानव हितेषी हैं और कोई नहीं।

 

सोचिए क्या इस तरह भारत निर्माण होगा। भारत विश्वगुरु बनना चाहता है किस में चापलूसी में या मानवता में।आप की सोच, कार्य करने की शैली, व्यवहार पे ही भारत की उन्नति-अवनति निर्भर है। स्वार्थ, झूठी प्रशंसा व चापलूसी से कही ज्यादा बढ़कर राष्ट्र है, स्वाभिमान है। इन्हें बचाना ही आज हर भारतीय का प्रथम व अंतिम कर्तव्य होना चाहिए क्योंकि ये बचे तो देश बचेगा और देश रहा तो हम रहेंगे। भारत की महान,अमिट, अजर अमर रहने वाली संस्कृति-सभ्यता रहेगी। सकारात्मक सोच अपनाएं और अपने तथा अपने परिवार, समाज तथा देश के कल्याण की बात सोचें। किसी ने कितना सही कहा है —

“सब ठाट पड़ा रह जाएगा ,

जब लाद चलेगा बंजारा।

बेटा-बेटी बंजारन साथ न जाएगी,

जब लाद चलेगा बंजारा।।

और किसी ने यह भी कहा है —

“बेटा-बनिता पड़े के पड़े रह गए।

मोती जवाहर जड़े के जड़े रह गए।

हंसा जब-जब उड़ा तो अकेला उड़ा।

राजा रहे वो रानी रही,

कहने – सुनने की केवल कहानी रही।

ना बुढ़ापा रही ना जवानी रही।

हंस जब-जब उड़ा तो अकेला उड़ा।।

डॉ आलोक रंजन

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