श्रीहरतालिका तीज व्रत कथा

श्रीहरतालिका तीज व्रत कथा

ॐ श्रीसूतजी ने कहा कि मंदार माला से श्रीगौरी के केश अलंकृत हैं मुंडों की माला से श्रीशिव की जटा अलंकृत हैं श्रीगौरी दिव्य वस्त्र धारण किये श्रीशिव दिगम्बर हैं ऐसी श्रीगौरीशंकर को प्रणाम करता हूँ । सुंदर कैलाश पर्वत के शिखर पर बैठी श्रीपार्वती कहती हैं हे श्रीमहेश्वर हमे कोई गुप्त व्रत रा पूजन बताये । जो सब धर्मों में सरल कम परिश्रम करना पड़े एवं फल अधिक मिले हे नाथ आप मुझ पर प्रसन्न हो तो वह विधान बताये। हे नाथ किस तप व्रत दान से आदि मध्य अंत रहित आप जैसे महाप्रभु मुझे मिले। श्रीशिव बोले हे देवी सुनो मैं तुम्हें एक उत्तम व्रत मेरा सर्वस्व छिपाने योग्य तुम्हारे प्रेम से वशीभूत हो कहता हूँ । नक्षत्रों में चंद्र ग्रहों में सूर्य वर्णों में ब्राह्मण देवों मे विष्णु नदियों में गंगा पुराणों में महाभारत वेदों मे सामवेद इन्द्रियों में मन श्रेष्ठ हैं । सब पुराण स्मृतियों में जिस तरह कहा मैं तुम्हें एक प्राचीन व्रत बताता हूँ एकाग्र मन से सुनो। जिस व्रत से तुमने मेरा आधा आसन पाया वह तुम्हें कहूँ तुम मेरी प्रेयसी हो । भाद्रपद मास में हस्त नक्षत्रयुक्त सुदी तीज तिथि को अनुष्ठान से स्त्रियाँ पापमुक्त होती हैं । हे देवी तुमने बहुत दिनों पहले हिमालय पर्वत पर इस व्रत को किया था । वह वृतांत कहूँ । श्रीपार्वती ने पूछा हे नाथ मैने यह व्रत क्यों किया? यह आपके मुख से सुनना चाहती हूँ । श्रीशिव ने कहा कि भारत के उत्तर में सुंदर पर्वत में श्रेष्ठ हिमवान पर्वत है। उसके आसपास भूमि में अनेक वृक्ष हैं अनेक पशु पक्षी उस पर रहते हैं वहाँ गन्धर्वों के साथ देवता सिद्ध चारण पक्षी गण सदैव प्रसन्न मन से विचारते हैं वहाँ गन्धर्व गाते अप्सराएँ नृत्य करती उस पर्वत के शिखर जिनमे स्फटिक रत्नादि की खाने भरी हैं । वह पर्वत ऊँचा आकाश छूता बर्फ से ढँका हैं वहाँ श्रीगंगाजल ध्वनि सुनाई देती हैं। हे देवी तुमने बाल्यकाल में पर्वत पर तपस्या की थी 12 वर्ष उल्टी टँगकर धुँआ पीकर रही वैशाख की दोपहरी में पंचाग्नि तापती रही। श्रावण में बरसते जल में भूखी प्यासी मैदान में बैठी रही तुम्हारे पिता तुम्हे इन कष्टों को सहन नही करते हुए तुम्हें देख दुःखी हुए । वे चिन्ता में होकर अपनी कन्या किसे दूँ उसी समय तब श्रीनारद तुम्हें देखने गये हिमाचल ने श्रीनारद अर्ध्य पाद्यादि से स्वागत कर श्रीनारद से पूछा आप किसलिए आये? आपका आना अच्छा हैं श्रीनारद ने कहा कि श्रीविष्णु का भेजा आया हूँ आपकी कन्या योग्य वर को दे । श्रीविष्णु के समान श्रीइन्द्रादि कोई भी वर नही हैं इसलिए आप आपकी कन्या श्रीविष्णु को दे । हिमालय ने कहा कि श्रीविष्णु मेरी कन्या लेना चाहते हैं आप संदेश लेकर आये तो उन्हें कन्या दूँगा तब श्रीनारद चले गये। वे पीताम्बर शंख चक्र गदा धारी श्रीविष्णु के पास गये 1श्रीनारद ने करबद्ध श्रीविष्णु से कहा आपका विवाह पक्का कर आया। हिमालय ने श्रीपार्वती से कहा मैंने तुम्हें श्रीविष्णु को दे दिया । तब पिता की बात सुन निरुत्तर हो सखी के घर गयी भूमि पर पड़ दुःखी हो विलाप करने लगी तुम्हारा विलाप सुन सखी बोली आपके दुःख का कारण कहो ।आपकी इच्छा पूरी करने की चेष्टा करुँगी। श्रीपार्वती ने कहा मेरी इच्छा सुनो मैं एक श्रीशिव को ही पति बनाना चाहती हूँ इसमें संशय नही हैं । मेरे पिता ने मेरी इच्छा ठुकरा दी । अब मैं शरीर त्याग दूँ । श्रीपार्वती की बात सुन सखियों ने कहा कि शरीर मत त्यागो हम वन में चले जहाँ आपके पिता को पता न चले तब तुम सखी के साथ वन में गयी । पिता तुम्हे घर घर खोजने लगे दूतों द्वारा खबर लेने लगे कि कौन देव राक्षस आदि मेरी कन्या को हर ले गया। मैंने श्रीनारद के आगे प्रतिज्ञा करी की कन्या श्रीविष्णु को दूँगा ऐसा सोच बेहोश हो गये । गिरिराज को बेहोश देख लोग दौड़े होश आने पर पूछा आपकी बेहोशी का कारण कहो । हिमवान ने कहा मेरे दुःख का कारण सुनो मेरी कन्या को कोई हर ले गया या काले साँप ने काट लिया या शेर बाघ खा गये हाय हाय मेरी बेटी कहाँ गयी? किस दुष्ट ने मेरी पुत्री को मारा हिमवान वायु के झोंके की तरह काँपने लगे । फिर तुम्हारे पिता वन वन ढूँढने लगे वन शेर आदि से भयानक लगा तुम भी सखी के साथ एक जगह गयी जहाँ नदी बह रही वहाँ एक गुफ़ा में मेरी बालू की मूर्ति बना निराहार रह आराधना करी जब भाद्रपद सुदी हस्त नक्षत्र युक्त तीज आई तब मेरी पूजा कर रात भर गीत वाद्यादि से गाकर जागरण कर मुझे प्रसन्न करने मे बिताया । तुम्हारे व्रतराज से मेरा आसन डोला मैं उस स्थान पर आया जहाँ तुम सखी के साथ व्रत कर रही । मैंने तुमसे कहा कि मैं तुम पर प्रसन्न हूँ बोलो क्या चाहती हो? तुमने कहा आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे पति बने मेरे द्वारा तथास्तु कह कर कैलाश पर्वत पर वापस आने पर वह बालू की मूर्ति नदी में प्रवाहित कर दी । सखी के साथ महाव्रत का पारण किया । हिमवान तुम्हें खोजते वन में आ गये सभी दिशाओं में तुम्हें खोजने से घबरा कर गिर गये।थोड़ी देर बाद उन्होंने नदी तट पर दो कन्यायें देखी फिर तुम्हें देख छाती से लगा रोने लगे फिर आपसे पूछा कि इस भयानक वन में क्यो आई? आपने कहा कि मैं अपने को श्रीशिव को सोप चुकी आपने मेरी बात टाली। इस कारण यहाँ आई। हिमवान ने कहा आपकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नही करुँगा तुम्हें अपने साथ घर लाकर मेरे साथ तुम्हारा विधि विधान से शुभ विवाह कर दिया । इसी से आपने मेरा अर्धासन पाया तब आज तक यह व्रत प्रकट करने का अवसर मुझे नही आया । हे देवी इस व्रत का नाम हरितालिका क्यों पड़ा? तुमको सखी हर ले गयी थी इसी से श्रीहरतालिका नाम पड़ा । श्रीपार्वती ने कहा हे नाथ आपने नाम तो बताया अब व्रत विधि पुण्य फल एवं व्रत कौन करे? यह भी बताये। श्रीशिव ने कहा हे देवी स्त्री जाति की भलाई हेतु यह व्रत हैं जो स्त्री सौभाग्य की रक्षा चाहती वह व्रत करे। केले के खम्भे का मंडप बना रेशमी वस्त्रों की झाँकी बना चंदन से सुगंध कर वाद्यों को बजाते मंगल गाते मंडप में श्रीशिवपार्वती की मूर्ति स्थापित करे। उस दिन उपवास रख बहुत सुगन्धित द्रव्यों से पूजन नैवेद्य लगा रात भर जागरण करे। ऋतु के पत्ते फलादि विशेष रखे । हे श्रीशिवे अर्थ दात्री शिवरुपिणी ब्रह्मरुपिणी जगद्धात्री आपको प्रणाम हैं । हे सिंहवाहिनी संसार भय से मुझ दीन की रक्षा करो इस इच्छा से आपकी पूजा की हैं । हे श्रीपार्वती मुझे राज्य एवं सौभाग्य दो प्रसन्न हो मुझ पर प्रसन्न हो। इन्हीं मंत्रों से श्रीपार्वती की पूजा करे। पति सहित पूजन कर कथा सुन दानादि संकल्प कर देवे । हे देवी जो स्त्री इस प्रकार पूजा करती वह पापों से छूट सात जन्म तक सुख सौभाग्य लेती हैं । जो स्त्री तीज को व्रत नही कर अन्न खाती वह सात जन्म तक बाँझ रह बार बार विधवा होना पड़ता हैं वह गरीब पुत्र शोक से दुःखी लड़ाकू दुःखी होती हैं उपवास नही करने वाली स्त्री नरक में जाती हैं । तीज को अन्न खाने से सूकरी फल खाने से बंदरिया पानी पीने से जोंक दूध पीने से नागिन मांस खाने से बाघिन मिठाई खाने से चींटी सभी वस्तुओं को खाने से मक्खी होती हैं सोने से अजगरी पति को धोखा देने मुर्गी होती हैं चौथ को दान कर व्रत पारण करे। जो स्त्री ऐसा व्रत करे वह मेरे समान पति पाकर मरने पर तुम्हारे समान उसका रुप हो जाता है। उस स्त्री को सुख एवं मोक्ष मिल जाता हैं यह श्रीहरतालिका व्रत कथा सुनने से एक हजार अश्वमेध यज्ञ सौ वाजपेय यज्ञ का फल मिलता हैं मैंने यह उत्तम व्रत बताया जिसको करके प्राणी पापों से छूट जाता हैं इसमें संशय नही हैं । भगवान श्रीशिव ने श्रीपार्वती को उनका पूर्व जन्म का स्मरण कराने हेतु यह श्रीहरतालिका तीज व्रत पूजन कथा कही थी। *जय हो श्रीगौरी*

🕉️हरतालिका व्रत ( तीज )पर विचार:-आचार्य सुनिल शास्त्री

भाद्रपदशुक्लपक्ष दिन शुक्रवार अंग्रेजी तारीख 21/8/20 प्रातः 4:15 से तृतीया प्रारंभ व रात्रि के 1:59 तक रहेगा , हस्त नक्षत्र रात्रि के 1:13 मिनट से प्रवेश करता है। इस वर्ष तीज का व्रत उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में ही हो पाएगा।

🕉️तीज पूजन का समय:-

21/8/20 को प्रातः 4:15 से रात्रि 1:59 तक तीज व्रत करने का शुभ समय है किसी प्रकार का दोष नहीं है । दिन एवं रात किसी भी समय अपना सुविधा के अनुसार तीज का व्रत कर सकते हैं।

 

🕉️व्रत का पारण का समय:-

 

दिनांक 22.8.2020 को प्रातः जितना जल्दी सुबह में आप चाहे पारण कर सकते हैं। पारण का समय में कोई बंधन नहीं है।

 

🕉️नोट:- इस वर्ष आश्विन मास में मलमास पड़ रहा है जो नई-नई पर वर्ती इस वर्ष व्रत करना चाहती है । वह व्रत कर सकती है। क्योंकि मलमास बाद में पड़ेगा और तीज पहले हो जाएगा।

आलेख आचार्य सुनील शास्त्री 7763073677; 6299823783

आचार्य विकेश पांडेय वाराणसी

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