इंतजार कब तक ! 21 वर्षों से बंद है मढ़ौरा का चीनी मिल

इंतजार कब तक ! 21 वर्षों से बंद है मढ़ौरा का चीनी मिल

 

सारण के ग्यारह प्रखंडों के करीब बीस हजार परिवारों को एक चीनी मिल की दरकार है। ये किसान परिवार वे हैं जो लगभग बीस वर्षों पूर्व तक खुशहाल थे। इनकी खुशहाली का राज इनके गन्ना की खेती थी। यह इनकी नकदी फसल थी, जो इन्हें संपन्न बनाये हुए थी। मढ़ौरा चीनी मिल बंद होने के बाद ये संपन्न किसान परिवार फिलहाल कंगाली के दौर से गुजर रहे हैं। चीनी मिल में ताला लगा तो इन किसानों की गन्ने की खेती भी बंद हो गयी। 2015 के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने अपनी चुनावी सभा में इस फैक्ट्री की चिमनी से धुआं उगलवाने का वादा किया था। यहां के बीस हजार से अधिक किसान परिवारों में एक आस जगी थी लेकिन वह वादा भी छलावा साबित हुआ। चुनाव संसदीय हो या विधानसभा की यहां के किसान व मजदूर सुगर फैक्ट्री के मसले को चुनावी मुद्दा बनाते रहे हैं। बनते मुद्दे को आश्वासन तो मिलते रहे हैं, लेकिन किसान-मजदूरों का मिल चलने का सपना अबतक पूरा नहीं हुआ।

 

1904 की स्थापित मढ़ौरा में चीनी मिल 1998 में हो गयी बंद

मढ़ौरा में कानपुर सुगर वर्क्स ने 1904 में चीनी मिल की स्थापना की थी। यह बिहार की सबसे पुरानी चीनी मिल थी। 1995 से इस चीनी मिल की दुर्गति शुरू हुई और 1998 के आते-आते इसमें पूरी तरह ताला लग गया। मिल बंद होने के साथ मढ़ौरा, अमनौर, तरैया, मशरक, पानापुर, इसुआपुर, मशरक, मकेर, परसा, दरियापुर व बनियापुर प्रखंडों के गांवों में गन्ना की खेती भी बंद हो गयी। इन प्रखंडों के सैकड़ों गांवों के लगभग 20 हजार किसान परिवारों की नकदी फसल छिन गयी। साथ ही करीब दो हजार मजदूरों की नौकरी व दिहाड़ी चली गई। आज भी इस मिल के पास किसानों व मजदूरों का करीब 20 करोड़ रुपये बकाया है।

 

20 हजार किसान परिवारों को पुरानी आय श्रोत की चाहत

मढ़ौरा किसान संघर्ष मोर्चा के रविरंजन सिंह, शंकर भगवान ओझा, भगत सिंह आदि कहते हैं कि यहां के किसानों को केवल चीनी मिल चाहिए। उनका कहना है कि यहां कें किसान परिवारों के लिए केन्द्र सरकार की आय दुगनी करने की घोषणा से मतलब नहीं। हमें दुगनी आय नहीं चाहिए बस केन्द्र सरकार उनकी पुरानी आय का स्रोत लौटा दे। वहीं मजदूर नेता रामबहादुर सिंह, कौशल किशोर सिंह व ओमप्रकाश सिंह कहते हैं कि मिल से जुड़े मजदूर परिवार फांकाकशी में हैं। अपने पुराने दिनों को याद करते हीं तो उनकी आखों से आंसू छलक पड़ते हैं। उनकी बकाया मजदूरी भी अबतक नहीं मिल पायी है।

 

2007 में पांच हजार एकड़ में लगे गन्ने किसानों को जलाने पड़े

यहां के किसानों को चीनी मिल चालू होने के आश्वासन का खामियाजा भी कम नहीं उठाना पड़ा है। 2007 में बड़े ही तामझाम के साथ चीनी मिल को चालू कराने की कवायद शुरू की गयी। पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के उद्योगपति जवाहर जायसवाल को इस मिल को चलाने के लिए बुलाया गया। फैक्ट्री कैम्पस में बड़ा समारोह आयोजित कर किसानों से गन्ने की खेती शुरू करने का आह्वान किया गया। यहां के किसानों ने भरोसा किया और करीब पांच हजार एकड़ में गन्ने की खेती उन्होंने की। लेकिन मिल नहीं चला और किसानों को अपनी तैयार गन्ने की फसल को खेत में ही जला देना पड़ा।

 

चीनी मिल का लोहा व ईंट उखाड़ ले जा रहे लोग

बंद मढ़ौरा चीनी मिल की परिसंपतियों को देखने वाला आज कोई नहीं है। फैक्ट्री की मशीनों में लगे तांबे, पीतल व लोहे लोग नोच कर ले जा रहे हैं। 52 कमरों के फैक्ट्री के गेस्ट हाउस व जीएम बंगला की लकड़ियां व लोहे भी लोग उठा कर घर ले जा रहे हैं। अब तो इसकी ईंट भी ढ़ो कर आसपास के लोग ले जा रहे हैं। फैक्ट्री का कोई केयर टेकर नहीं और स्थानीय प्रशासनिक व पुलिस अफसरों को भी रोज चोरी हो रही इसकी परिसंपत्तियों से मतलब नहीं है।

 

मढ़ौरा सुगर फैक्ट्री प्रधानमंत्री के आश्वासन व वादे के बाद भी नहीं चालू हो सका। कानपुर सुगर वर्क्स लिमिटेड की यह फैक्ट्री भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय के अधीन है। इसके जीर्णाद्धार की पूरी जवाबदेही केन्द्र सरकार की है। इस फैक्ट्री के बंद होने के बाद यहां के किसान व मजदूर आर्थिक रूप से बदहाल हो चुके हैं। इन्होंने चुनाव में इस फैक्ट्री को मुद्दा बनाया है और जबादेह लोगों से सवाल पूछ रहे हैं।

सारण के सभी वोटरस .

Dharmendra Kumar News4bihar Saran

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